क़ुरआन मजीद

सूरह यासीन: जानिए इसे क़ुरआन का दिल क्यों कहा जाता है?

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सूरह यासीन (Surah Yaseen) क़ुरआन मजीद का 36वाँ सूरह है और मुसलमानों की ज़िंदगी में इसका बहुत गहरा मुक़ाम है। इसे "क़ुरआन का दिल" कहा जाता है, क्योंकि यह इस्लाम के बुनियादी पैग़ाम—अल्लाह की तौहीद (एक होने), नबियों की रिसालत, और मरने के बाद की ज़िंदगी (आख़िरत)—को बहुत ही असरदार तरीके से बयान करता है।

"दिल" होने का क्या मतलब है?

नबी करीम (PBUH) की एक मशहूर हदीस है: "हर चीज़ का एक दिल होता है, और क़ुरआन का दिल सूरह यासीन है।" (तिर्मिज़ी)। जिस तरह दिल इंसान के जिस्म को ज़िंदगी और ताक़त देता है, उसी तरह सूरह यासीन क़ुरआन के पैग़ाम का रूहानी मरकज़ (Center) है। यह इंसान के ईमान को ताज़ा करता है।

सूरह यासीन पढ़ने की फ़ज़ीलत और फ़ायदे

पाबंदी से सूरह यासीन पढ़ने या सुनने से मोमिन की ज़िंदगी में ढेरों बरकतें आती हैं:

💡 क्या आप जानते हैं? सूरह यासीन में कुल 83 आयतें हैं। जो शख्स सुबह के वक़्त इस सूरह की तिलावत करता है, अल्लाह उसके उस दिन के तमाम जायज़ काम पूरे फरमाता है।

ग़ौर-ओ-फ़िक्र (तदब्बुर) की ताक़त

सिर्फ पढ़ने के अलावा, सूरह यासीन के मायने पर ग़ौर करना हमारे ईमान को मज़बूत करता है। यह सूरह कुदरत की निशानियों—दिन और रात के बदलने, बंजर ज़मीन के दोबारा ज़िंदा होने और आसमान के निज़ाम—का ज़िक्र करती है, ताकि हमें याद रहे कि जिस अल्लाह ने ये सब बनाया है, वह हमें मरने के बाद आसानी से ज़िंदा कर सकता है।

क़ुरआन के दिल को महसूस करें

दुनिया के बेहतरीन क़ारियों की आवाज़ में सूरह यासीन सुनें। Nur Vakti ऐप के साथ आप तिलावत सुनने के साथ-साथ इसका तर्जुमा (अनुवाद) भी पढ़ सकते हैं।